Wednesday, November 16, 2011

अब बुलाने से भी तू नहीं आता

अब बुलाने पर भी तू नहीं आता
मंदिरों-शिवालों  से भी तेरे रहने का पता नहीं पाता|
कभी तो कण-कण में तेरे होने का अहसास था
अब तो मंदिरों की घंटियाँ बजाने पर भी तुझे पास नहीं पाता|

वक़्त वो भी था जब मांगने से पहले ही तू सब कुछ दे जाता था 
सच्चाई की जीत के लिए खुद ही धरती पर उतर आता था 
इक विश्वास पर सारथि भी बन जाता था तू
इक आस्था पर प्राण भी लौटा जाता था तू

फिर आज तुझे क्या हो गया
आज तू कहाँ सो गया 

एक ही रावन था  तब जब तू धरती पर आया था
एक ही द्रोपदी थी जिसका चीर-हरण बचाया था
एक ही प्रहलाद था जब सिंह रूप तुमने धर डाला

फिर आज क्यों ,
हर बार कोई रावन ही जीत जाता है
हर रोज ही किसी द्रोपदी का चीर-हरण हो जाता है
और हर रोज ही एक प्रहलाद यही कहते हुए मर जाता है
कि
अब बुलाने से भी तू नहीं आता.

5 comments:

  1. Beautifully versed Rishu... It's getting better day by day.

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  2. very powerful...gr8 u showed some versatality by touching a differet aspect

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  3. OOO la la….I can see a great creativity which is in your mind. I loved the vision most. Waiting for the next greater write up honey :)

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